अनमोल सुक्तियां भाग-3

लाठी के बल पर प्राप्त वस्तु टिकाऊ नहीं होती।
-सुभाषित
जब कोई तुमसे लचककर बात करे, तो समझो कुद मांगने वाला है।
-कार्लाइल
लघु से दीर्ध उत्पन्न होता है।
-चार्वाक



जीवन मं सारे महत्वपूर्ण निर्णय व्यक्ति अकेले में करता है सारे दर्द अकेले में भोगता है-और तो और प्यार के चरम आत्मसमर्पण का सब से बड़ा दर्द भी-मिलने से जो विरह का परम रस होता है-तुम जानते हो उसे? सपर्मण के धधकते क्षण में जब ज्ञान चीत्कार कर उठता ह कि हम अलगही है, देनासंपूर्ण नहीं हुआ, कि मिटने में भी मैं मैं हूँ, तू तूहैं, मै तेनहीं हूँ और हमारी मांग बाकी-इतना अभिन्न मिलन क्या हो सकता है, कि मांग बाकीनरहे, सारी सृष्टि में रमा हुआ ईयवर भी तो अकेला है, अपनी सर्वव्यापित मे अकेला अपनी, अपनी अद्वितीय में अयुत, विरही।
-अज्ञेय
जो वस्तु हमारे भीतर जाती है, उसके कारण हम भ्रष्ट नहीं होते, किंतु जो हमसे बाहर है वही बिगड़ती है।
-स्वामी रामतीर्थ
जब कभी कोई मनुष्य किसी वस्तु मं सुखान्वेषण की चेष्टा करता है, तब उसे धोखा होता है, वह तुरंत इंद्रियों द्वारा ठगा जाता है।
-स्वामी रामतीर्थ
विज्ञान और कला का संबंध समस्त विश्वसे है ओर उनके आगे राष्ट्रीयता की सीमाएं लुप्त हो जाती है।
-गेटे
यदि तुम विचार नहीं हो, तो फिर तुम मानव ही क्यों हो?
-काॅलरिज
असत्य सबसे बड़ा विष है।
-ऋषि आंगिरा
सुख को चाहें तो विद्या छोड़ दे और विद्या को चाह तो सुख छोड़ दे।
-चाणक्य
भक्त की मार से कोई नहीं बचता है
-भृतहरि
विज्ञान और कला की संबंध समस्त विश्वसे है और उनके आगे राष्ट्रीयता की सीमाएं लुप्त हो जाती है।
-गेटे
वास्तविकता का ज्ञान देर से होता है।
-जनक
जो अपने वश में नहीं, वह किसी का भी गुलाम बन सकता है।
-मनु
मन को वश में करो। दुनिया तुम्हारे वश में रहेगी।
-वशिष्ठ
माता, पिता गुरु और स्वामी का वचन शुभ जानकर बिना विचार के पालन किया जाता है।
-गोस्वामी तुलसीदास
हंसी-मजाक में भी कड़वे वचन आदमी के दिल में चुभ जाते हैं।
-संत तिरुवल्लुवर

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